स्वामी दयानन्द के मत में पुनर्जन्म
सुषमा नारा
म0 नं0 368, सैक्टर-14, रोहतक (हरियाणा)
पुनर्जन्म
स्वामी दयानन्द ने अपने दार्षनिक अध्ययन में अनेक ग्रंथों में विभिन्न विषयों का उल्लेख किया है। स्वामी दयानन्द ने पुनर्जन्म विषय को भी विभिन्न ग्रन्थों में वैदिक प्रमाणों के साथ स्पष्ट किया है। उन्होंने अपने ग्रन्थों में विभिन्न वेदों व दर्षनों का प्रमाण देकर पुनर्जन्म विषय का स्पष्टीकरण किया है। उनकी यह पुनर्जन्म संबधि विचारधारा दार्षनिक जगत् में एक अलग प्रकार की विचारधारा है। वे ऋग्वेद का उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं
‘असुनीते पुनरस्मासु .......................................या स्वस्तिः।’1
अर्थात् हे सुखदायक परमेष्वर । आप कृपा करके पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रियां स्थापन कीजिए, तथा प्राण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अंहकार, बल, पराक्रम आदि युक्त शरीर पुनर्जन्म में कीजिए। हे जगदीष्वर। इस संसार अर्थात् इस जन्म और परजन्म में हम लेाग उत्तम भोगों को प्राप्त हों, तथा हे भगवान्। आपकी कृपा से सूर्यलोक, प्राण और आपको विज्ञान तथा प्रेम से सदा देखते रहें। हे अनुमते अर्थात् सबको मान देने वाले, सब जन्मों में हम लोगों को सुखी रखिए, जिससे हम लोगों को स्वस्ति अर्थात् कल्याण की प्राप्ति हो।2ं
इस प्रकार ऋग्वेदीय प्रमाणों से दयानन्द पुनर्जन्म का होना सिद्ध करते हैं, क्योंकि उसमें जीवात्मा परजन्म के लिए ईष्वर से उत्तम शरीर व उत्तम व्यवस्थाओं के लिए प्रार्थना करता है। जिससे पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि होती है।
स्वामी दयानन्द अपने ग्रंथ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में कहते हैं कि जो मनुष्य पूर्वजन्म में धर्माचरण करता है, उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारणकत्र्ता और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त करता है।3
स्वामी दयानन्द पुनर्जन्म के विषय में अथर्ववेद का उदाहरण देते हैं कि हे जगदीष्वर! आपकी कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रियां मुझ को प्राप्त हों अर्थात् सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे। पूर्वजन्मों मे शुभ गुण धारण करने वाली बुद्धि के साथ मनुष्य देह के कृत्य करने में समर्थ हो। ये सब बुद्धि के साथ मुझको यथावत् प्राप्त हो। जिनसे हम लोग इस संसार में मनुष्य जन्म को धारण करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सदा सिद्ध करें, और इससे आपकी भक्ति को सदा पे्रम से किया करें। जिससे किसी जन्म में भी हमकों दुःख प्राप्त न हो।4
स्वामी दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में इस पुनर्जन्म विषय को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जो पूर्वजन्म में किए हुए पाप पुण्यों के फलों को भोग करने के स्वभाव युक्त जीवात्मा है, वह पूर्व षरीर को छोड़ कर वायु के साथ रहता है, पुनः जल औषधि या प्राण आदि में प्रवेष करके वीर्य में प्रवेष करता है, तदनन्तर योनि अर्थात् गर्भाषय में स्थिर होकर पुनः जन्म लेता है। जो जीव अनुदित वाणी अर्थात् जैसी ईष्वर ने वेदों में सत्यभाषण करने की आज्ञा दी है, वैसा ही यथावत् जानकर बोलता है, और धर्म में ही यथावत् स्थित रहता है। वह मनुष्य योनि में उत्तम शरीर धारण करके अनेक सुखों को भोगता है, और जो अधर्माचरण करता है। वह अनेक नीच शरीर अर्थात् कीट पतंगे पषु आदि के शरीर को धारण करके अनेक दुखों को भोगता है।5
विभिन्न भारतीय दर्षनों ने भी पुनर्जन्म के सिद्धान्त को माना है। अतः स्वामी जी ऋ0 भा0 भू0 में योगदर्षन का उदाहरण देते हैं -
‘स्वरसवाही विदुषोऽपि तथाऽभिरूढोऽभिनिवेषः।’6
अर्थात् हर एक प्राणियों की यह इच्छा नित्य देखने में आती है कि मैं सदैव सुखी बना रहूँ और मरूँ नहीं। यह इच्छा कोई भी नहीं करता कि मैं न होऊं। ऐसी इच्छा पुनर्जन्म के अभाव से कभी नहीं हो सकती। यह ‘अभिनिवेष’ क्लेष कहलाता है, जो कि कृमिपर्यन्त को भी मरण का भय बराबर होता है। यह व्यवहार पूर्वजन्म की सिद्धि को बताता है।7
स्वामी जी न्यायदर्षन का उदाहरण देकर8 कहते हैं कि -
जो उत्पन्न अर्थात् किसी शरीर को धारण करता है, वह मरण अर्थात् षरीर को छोड़कर, पुनरूत्पन्न दूसरे शरीर को भी अवष्व प्राप्त होता है। इस प्रकार मरकर पुनर्जन्म लेने को ‘पे्रत्यभाव’ कहते हैं।9 स्वामी दयानन्द भी अपने ग्रन्थों में इसी प्रकार की अवधारणा स्पष्ट करते हैं।
अपने ग्रंथों में स्वामी दयानन्द सांख्य दर्षन का उदाहरण भी देते हैं -
‘इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः।’10
अर्थात् जैसे इस समयबद्ध-मुक्त जीव है, वैसे ही सर्वदा रहते हैं। अत्यन्त विच्छेद बन्ध या मुक्ति कभी नहीं होता, किन्तु बन्ध और मुक्ति सदा नहीं रहती। अतः सांख्य दर्षन भी इस पुनर्जन्म सिद्धान्त को स्वीकार करता है।11
पुण्यापुण्यकर्मफल
स्वामी दयानन्द पुण्य अपुण्य कर्म फल के सिद्धान्त को मानते हैं, उनके अनुसार मनुष्य के पुण्य कर्म उसे अच्छे फल प्रदान करते हैं, तो अपुण्य कर्म अर्थात् बुरे कर्म उसे बुरे फल में प्रवृत करते हैं, और जीवात्मा को बुरे व अच्छे कर्मानुसार ही शरीर भी प्राप्ति होती है वे युजर्वेद भाष्य में लिखते हैं कि हे मनुष्यांे। ये जीव जब शरीर को छोड़ते हैं, तब सूर्यप्रकाष आदि पदार्थों को प्राप्त होकर कुछ काल भ्रमण कर अपने कर्मों के अनुकूल गर्भाष्य को प्राप्त हो, शरीर धारण कर उत्पन्न होते हैं, तभी पापपुण्य कर्म से सुखदुख रूप फलों को भोगते हैं।12
स्वामी दयानन्द जी ऋ0 भा0 भू0 में जीवात्मा के कर्मफलभोग को तीन भागों का वर्णन करते हैं - पितृयान, देवयान और कीटपतंगयोनि।
इस संसार में हम दो प्रकार के जन्मों को सुनते है। एक मनुष्य शरीर का धारण करना और दूसरा नीच गति से पषु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष आदि का होना। इसमें मनुष्य शरीर के तीन भेद हंै - एक पितृ अर्थात् ज्ञानी होना, दूसरा देव अर्थात् सब विद्याओं को पढ़कर विद्वान् होना, तीसरा मत्र्य अर्थात् साधारण मनुष्य शरीर का धारण करना। इसमें प्रथम गति अर्थात् मनुष्य शरीर पुण्यात्माओं और पुण्यपाप तुल्य वालों का होता है, और दूसरा जो जीव अधिक पाप करते हैं, उनके लिए है। इन्हीं भेदों से सब जगत् के जीव अपने - अपने पुण्य और पापों के फल भोग रहे हंै। जीवों को माता और पिता के शरीर में प्रवेष करके जन्मधारण करना, पुनः शरीर का छोड़ना, फिर जन्म को प्राप्त होना, बारंबार होता है।13
पूर्वजन्म की स्मृति
स्वामी दयानन्द कहते हैं कि अनेक मनुष्य ऐसा प्रष्न करते हैं कि जो पूर्वजन्म होता है तो हमको ज्ञान इस जन्म में क्यों नहीं होता। इस पूर्व पक्ष का समाधान करते हुए वे कहते हैं कि -
“जब इसी जन्म में जो -जो सुख - दुख तुमने बाल्यावस्था में अर्थात् जन्म से पांच वर्ष पर्यन्त पाये हैं, उनका ज्ञान नहीं रहता, अथवा जो कि नित्य पठन-पाठन और व्यवहार करते हैं, उनमें से भी कितनी ही बातें भूल जाते हंै, तथा निद्रा में भी यही हाल हो जाता है। कि अब के किये का भी ज्ञान नहीं रहता। जब इसी जन्म के व्यवहारों को इसी शरीर में भूल जाते हंै, तो पूर्व शरीर के व्यवहारों का ज्ञान कैसे रह सकता है।14
स्वामी जी ने यही बात सत्यार्थ प्रकाष के नवम् समुल्लास में भी स्पष्ट की है। वे प्रष्नोत्तर माध्यम से कहते हैं ।
प्रष्नः जो अनेक (जन्म) हो तो पूर्व जन्म और मृत्यु की बातों का स्मरण क्यों नहीं।
उत्तर: जीव अल्पज्ञ है, त्रिकालदर्षी नहीं, इसीलिए स्मरण नहीं रहता। और जिस मन से ज्ञान करता है, वह भी एक समय में दो ज्ञान नहीं कर सकता। भला पूर्वजन्म की बात तो दूर, इसी देह मे जब गर्भ में जीव था, शरीर बना, पष्चात् जन्मा, पांचवें वर्ष से पूर्व तक जो - जो बातें हुई है, उनका स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और जागृत और स्वप्न का बहुत सा व्यवहार प्रत्यक्ष में करके जब सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा होती है, तब जागृत आदि व्यवहार का स्मरण क्यों नही कर सकता ? और तुम से कोई पूछे कि बारह वर्ष के पूर्व तेरहवें वर्ष के पांचवे महीने के नवमें दिन दष बजे पर पहली मिनट में तुमने क्या किया था ? तुम्हारा मुख, कान, नेत्र, शरीर किस ओर, किस प्रकार का था ? और मन में क्या विचार था ? तुम कुछ न बता सकोगे। जब इसी शरीर में ऐसा है तो पूर्व जन्म की बातों के स्मरण में शंका करनी केवल लड़कपन की बात है। और जो स्मरण नहीं होता है, इसी से जीव सुखी है, नहीं तो सब जन्मों के दुःखों को देख-देख दुःखित होकर मर जाता। जो कोई पूर्व और पीछे जन्म के वर्तमान को जानना चाहे तो भी नहीं जान सकता, क्योंकि जीव का ज्ञान और स्वरूप अल्प है, यह बात ईष्वर के जानने योग्य है, जीव के नहीं।15
मुक्त जीवों का भी पुनर्जन्म
सामान्य रूप से भारतीय दर्षन की यह मान्यता कि मोक्ष ऐसी एकान्तिक व आत्यन्तिक सुख की अवस्था है जिससे पुनरावर्तन नहीं होता है किन्तु स्वामी दयानन्द विष्व दर्षन को एक नया विचार देते हैं कि मुक्ति के आनन्द को भोगकर पुनः जन्म मरण के चक्र में आ जाता है। इस प्रकार मुक्तात्माओं का भी पुनर्जन्म होता है।
स्वामी दयानन्द के अनुसार मुक्त जीवों का पुनर्जन्म इस कारण से सिद्ध होता है, क्योंकि प्रथम तो जीव का सामथ्र्य, शरीरादि पदार्थ और साधन परिमित हैं, पुनः उसका फल अनन्त कैसे हो सकता है। अनन्त आनन्द को भोगने का असीम सामथ्र्य, कर्म और साधन जीवों में नहीं, इसीलिए अनन्त सुख नहीं भोग सकते। जिनके साधन अनित्य है, उनका फल नित्य कभी नहीं हो सकता। और जो मुक्ति में से लौटकर कोई जीव इस संसार में न आवे तो संसार का ‘उच्छेद’ अर्थात् जीव निष्षेष हो जाने चाहिए।
मोक्ष में दीर्घावधिपर्यन्त सुखानुभूति के अनन्तर पुनर्जन्म लेकर पुनः सांसारिक दुःखों की प्राप्ति को तर्कतः सिद्ध करने के लिए स्वामी दयानन्द लिखते हैं -
दुःख के अनुभव के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। जैसे कटु न हो तो मधुर क्या, जो मधुर न हो तो कटु क्या कहलाये ? क्योंकि एक स्वाद के एक रस के विरूद्ध होने से दोनों की परीक्षा होती है। जैसे कोई मनुष्य मीठा मधुर ही खाता - पीता जाये उसको वैसा सुख नहीं होता जैसा सब प्रकार के रसों के भोगने वाले को होता है।
और जो ईष्वर अन्तवाले कर्मों का अनन्त फल देवे तो उसका न्याय नष्ट हो जाये, तो जितना भार उठा सके उतना उस पर रखना बुद्धिमानों का काम है। जैसे एक मन भार उठाने वाले के सिर पर दष मन धरने से भार रखने वाले की निन्दा होती है, वैसे अल्पज्ञ, अल्पसामथ्र्य वाले जीव पर अनन्त सुख का भार रखना ईष्वर के लिए ठीक नहीं।16
इस प्रसंग में स्वाभाविक प्रष्न यह हो सकता है कि जब मुक्त जीवों का भी पुनर्जन्म होता है तो मुक्ति भी जन्म-मरण के सदृष है। इसके लिए श्रम करना व्यर्थ है ? इस प्रष्न के समाधान रूप में स्वामी दयानन्द को अभीष्ट है कि मुक्ति जन्म-मरण के सदृष नहीं है। क्यांेकि जब तक 36000 बार उत्पत्ति और प्रलय का जितना समय होता है, उतना समय पर्यन्त जीवों को मुक्ति के आनन्द में रहना, दुःख का न होना, क्या छोटी बात है, जब आज खाते-पीते हो, कल फिर भूख लगने वाली है, पुनः इसका उपाय क्यों करते हो, जब क्षुधा, तृषा, क्षुद्र, धन, राज्य, प्रतिष्ठा, स्त्री, सन्तान आदि के लिए उपाय करना आवष्यक है, तो मुक्ति के लिए क्यों न करना ? जैसे मरना अवष्य है, तो भी जीवन का उपाय किया जाता है। वैसे ही मुक्ति से लौटकर जन्म में आना है, तथापि इसका उपाय करना आवष्यक है।17
स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाष में स्पष्ट करते हैं कि मुक्ति के बाद पुनर्जन्म भी मनुष्य के लिए अच्छे बुरे कर्मों पर निर्भर करता है।
स्वामी जी कहते हैं कि एक जीव विद्वान्, पुण्यात्मा, श्रीमान् राजा की रानी के गर्भ में आता है और दूसरा महादरिद्र घसियारी के गर्भ में आता है। एक को गर्भ से लेकर सर्वथा सुख और दूसरे को सब प्रकार दुख मिलता है। जब एक जन्मदाता है तब सुन्दर सुगन्धितयुक्त जलादि से स्नान, युक्ति से नाड़ी छेदन, दुग्धपानादि यथायोग्य प्राप्त होते हैं। जब वह दूध पीना चाहता है, तो उसके साथ मिश्री आदि मिलाकर यथेष्ट मिलता है। उसको प्रसन्न रखने के लिए नौकर-चाकर, खिलौना सवारी उत्तम स्थानों में वास से आनन्द होता है। दूसरे का जन्म जंगल में होता है, स्नान के लिए जल भी नहीं मिलता, जब दूध पीना चाहता है, तब दूध के बदले में लताड़ मिलती है, वह अत्यन्त आत्र्तस्वर से रोता है । उसे कोई नहीं पूछता। इत्यादि जीवों को बिना पुण्य - पाप के सुख दुख होने से परमेष्वर पर दोष आता है।18़़़ दूसरा जैसे बिना किए कर्मों के सुख दुख मिलते हैं तो आगे नरक स्वर्ग भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि जैसे परमेष्वर ने इस समय बिना कर्मों के सुख, दुख दिया है। वैसे मेरे पीछे भी जिसको चाहेगा उसको स्वर्ग में और जिसको चाहे नरक में भेज देगा। पुनः सब जीव अधर्मयुक्त हो जाएंगे। धर्म क्यों करें, धर्म का फल मिलने से संदेह है। परमेष्वर के हाथ है, जैसी उनकी प्रसन्नता होगी वैसा करेगा तो पापकर्मों में भय न होकर संसार में पाप की वृद्धि और धर्म का क्षय हो जाएगा। इसलिए पूर्व जन्म के पुण्य पाप के अनुसार वर्तमान जन्म और वर्तमान जन्म तथा पूर्वजन्म के कर्मानुसार भविष्यत् जन्म होते हैं।19
स्वामी जी ने इस पुण्यापुण्य कर्मफल को स्वीकार किया है कि पुण्यात्माओं को उत्तम शरीर की प्राप्ति होती हैं, व पापात्माओं अथवा निकृष्ट कर्म करने वालों को उसी प्रकार के शरीर कृमि, कीट आदि की प्राप्ति होती हैं।20
जब जीवात्मा शरीर से निकलता है उसी का नाम ‘मृत्यु’ और शरीर के साथ संयोग का नाम ‘जन्म’ है। जब शरीर छोड़ता है तब यमालय अर्थात् आकाषस्थ वायु में रहता है, क्योंकि ‘यमेन’ वायुना’ वेद में लिखा है कि यम नाम वायु का है। इनके पष्चात् धर्मराज अर्थात् परमेष्वर उस जीव के पास पुण्यानुसार जन्म देता है। वह वायु अन्न, जल अथवा शरीर के छिद्र द्वारा दूसरे के शरीर में ईष्वर की प्रेरणा से प्रविष्ट होता है। जो प्रविष्ट होकर क्रमषः वीर्य में जा गर्भ में स्थित हो, शरीर धारण कर, बाहर आता है। जो स्त्री के शरीर धारण करने योग्य कर्म हो तो स्त्री और पुरूष के शरीर धारण करने योग्य हों तो पुरूष के शरीर में प्रवेष करता है।21
स्वामी जी कहते हैं कि इसी प्रकार नाना प्रकार के जन्म मरण मंे तब तक जीव पड़ा रहता है कि जब तब उत्तम कर्मोपासना ज्ञान को करके मुक्ति को नहीं पाता। क्योंकि उत्तम कर्मादि करने से मनुष्यों में उत्तम जन्म और मुक्ति मंे महाकल्प पर्यन्त जन्म-मरण दुःखों से रहित होकर आनन्द में रहता है।
स्वामी दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के पुनर्जन्म विषय में ईष्वर से उत्तम शरीर की कामना करते हैं, जिससे वह उत्तम शरीर द्वारा उत्तम कर्मों को करके पुनर्जन्म में भी अच्छे गुणों वाला होकर वास करे। वे कहते हैं कि जो विष्व में विराजमान ईष्वर है, वह सब जन्मों में हमारे शरीरों का पालन करे और सब जन्मों में हमारे शरीर का पालन करे और सब दुःखों से पुनर्जन्म में अलग रखे। हे ईष्वर। आपकी कृपा से ही इन महादुुखों से छूटकर, आपके पूर्ण प्रेम को प्राप्त करके, इस जन्ममरणरूप दःुखसागर से हम मनुष्य छूट सकते हैं।22
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द दुःख रहित आनन्द की अवस्था मोक्ष को जीवन का लक्ष्य स्वीकार करते हैं। और उनके अनुसार बैकुण्ठ लोक जैसा कोई निष्चित मोक्ष-स्थान नहीं है। मुक्त जीव अव्याहतगति से ब्रह्म में आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरण करता है।
ब्रह्म में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करने का अभिप्राय यह है कि मोक्ष की अवस्था में जीव का ब्रह्म में लय नहीं होता उसकी स्वतन्त्र सत्ता बनी रहती है।
ऋ0 भा0 भू0 ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द मुक्त जीव का एक निष्चित कालावधि के पष्चात् इस जगत् में पुनरावर्तन स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार मुक्ति काल की अवधि परान्तकाल है। जो मानवीय गणना के अनुसार 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्ष बैठती है। इस कालावधि तक मुक्त जीव आनन्द का उपभोग करके स्वामी दयानन्द के अनुसार पुनः संसार में लौट आता है। यहां विचारणीय यह है कि इस अवधि के पष्चात् उसके पुनरावर्तन में हेतु क्या है ? इच्छा, कर्म अथवा कुछ अन्य ? मुक्ति की अवधि निष्चित मानने से इच्छा का तो स्वतः विघात हो जाता है। क्योंकि अवधि की समाप्ति पर उस मुक्त जीव को लौटना ही है। जहां तक कर्म की बात है तो मुक्ति की अवस्था में जीव कोई कर्म नहीं करता केवल आनन्द का उपभोग करता है। पुनः उसके पुनरावर्तन मंे अवधि का समाप्त होना ही हेतु प्रतीत होता है। स्वामी दयानन्द की यह मान्यता अन्य दार्षनिक विचारधारा से मेल नहीं खाती।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. ’’असुनीते पुनरस्मासु चक्षु पुनः प्राणमिह नो द्योहि भोगम्। ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृडया नः स्वस्ति।।’’ ऋ0, अ0 8, 1, व0 - 23, मं0 6, 7।
2. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पुनर्जन्म विषय, महर्षि दयानन्द सरस्वती, झण्डेवालन, अजमेरी गेट, दिल्ली - 4, प्रथम संस्करण - 1998, पृ0 सं0 - 227।
3. वही पृ0 सं0 - 230।
4. पुनर्मत्विन्द्रियं कल्पयन्तामिहैव, अथर्ववेद, काण्ड-7, अनु0-6, व0 - 67, मं0-1
5. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पुनर्जन्म विषय, महर्षि दयानन्द सरस्वती, झण्डेवालन, अजमेरी गेट, दिल्ली - 4, प्रथम संस्करण - 1998, पृ0 सं0 - 230।
6. पतंजलि योगसूत्र, पाद-2, सूत्र-0।
7. ऋ0 भा0 भू0, पु0 वि0, पृ0 सं0 - 232।
8. ‘पुनरूत्पत्ति प्रेत्यभावः’ न्यायदर्षन आ01, अ01, सू0 - 29।
9. ऋ0 भा0 भू0, पु0 वि0, पृ0 सं0 - 233।
10. सांख्य सूत्र - 1.15 9 महर्षि कपिल, भारतीय विद्या प्रकाषन, वाराणसी, संस्करण, 1977।
11. दयानन्द सिद्धान्त सन्दर्भ कोष, प्रो0 ज्ञान प्रकाष शास्त्री, परिमल पब्लिकेषन, शक्ति नगर दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2011, पृ0 सं0 - 564।
12. युर्जेवेद भाष्य - 39.6 महर्षि दयानन्द, आर्ष सहित्य प्रचार ट्रस्ट, खारी बावली, दिल्ली -6, 1973।
13. ऋ0 भा0 भू0, पु0 वि0, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महर्षि दयानन्द सरस्वती, झण्डेवालन, अजमेरी गेट, दिल्ली - 6, प्रथम संस्करण - 1998, पृ0 सं0 - 232।
14. वही पृ0 सं0 - 232।
15. सत्यार्थ प्रकाष, नवम् सम्मुल्लास, स्वामी दयानन्द सरस्वती, आर्य साहित्य प्रचार ट्रस्ट, खारी बावली, 65वां संस्करण नवम्बर-2007, दिल्ली-3, पृ0 सं0 - 167।
16. दयानन्द सिद्धान्त सन्दर्भ कोष, प्रो0 ज्ञान प्रकाष शास्त्री, परिमल पब्लिकेषन्स, शक्तिनगर, दिल्ली, पृथम संस्करण-2011, पृ0 सं0 - 565।
17. वही पृ0 सं0 - 565।
18. सत्यार्थ प्रकाष, नवम् सम्मुल्लास, पृ0 सं0 - 178।
19. वही पृ0 सं0 - 179।
20. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पुनर्जन्म विषय, पृ0 सं0 - 230।
21. वही पृ0 सं0 - 179-180।
22. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पुनर्जन्म विषय, पृ0 सं0 - 229।
Received on 11.06.2013
Revised on 22.06.2013
Accepted on 28.06.2013
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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(1): January-March, 2013, 238-241